केजरीवाल को क्यों छोड़ दिया पूर्व संपादक और पत्रकार ने

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Arun Pandey from Delhi

एक चैनल के पूर्व संपादक समेत दो लोगों ने केजरीवाल का साथ छोड़ा. मेरे हिसाब से इससे बड़े सबक मिलते हैं और आंखें खुलती हैं.

पहला सबक- राजनीति की दशा और दिशा बदलने का नारा खोखला है, हर व्यक्ति राजनीति में स्वार्थ के लिए आता है.. काम नहीं बनता तो साथ छोड़ जाता है..

दूसरा सबक- पद मिल जाए तो सिद्धांतों से समझौता किया जा सकता है लेकिन अगर पद ना मिले तो सिद्धांत ही जीने और पार्टी छोड़ने का सहारा बन जाते हैं

तीसरा सबक- राज्यसभा की टिकटें बेचनी नहीं चाहिए वरना सांसद बनने के चक्कर में पार्टी में आए पत्रकार साथ छोड़ जाते हैं..

चौथा सबक- बडे़ पत्रकारों को बड़ा राजनीतिक पद मुफ़्त में पाने का हक़ है क्योंकि वो अपने पूर्व पद( चैनल या अख़बार के संपादक) का पर्याप्त दुरुपयोग करके फ़ायदा पहुँचाकर यहाँ तक पहुँचे है. अब वो अपने पूर्व पुण्यों की आपसे क़ीमत चाहते हैं लेकिन आपको गुप्ता एंड गुप्ता पसंद आ जाते हैं.

पांचवा सबक- केजरीवाल जी जब सारे पद खुद चाहते हैं तो दूसरों को ऐसा चाहने का हक़ क्यों नहीं. बाकी लोग क्या पद की कुर्बानी दें.

छठा सबक- बहुत से बुद्धिमान संपादक दूरदर्शी होते हैं वो हाथोंहाथ पारिश्रमिक ले लेते हैं भविष्य के लिए कुछ नहीं छोड़ते. काम के तुरंत बाद सर्विस चार्ज ले लेना चाहिए. वरना राजनेताओं का मन बदल गया तो कुछ हाथ नहीं आता.

सातवां सबक- केजरीवाल से कुछ पाने के लिए ज़रूरी है आप हमेशा कुछ देने की हालत में हों, आप बेकार हुए तो मुख्यमंत्री आपको बेकाम (बिना काम का) मान लेते हैं.

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