अटल जी ने पत्रकारिता की शुरूआत बनारस से ही की

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अटल जी ने पत्रकारिता की शुरूआत बनारस से ही की

रितेश श्रीवास्तव अंशू

Vajpayee the journalist

वाराणसी, 18 अगस्त:सीएमसीः लंबी बीमारी के बाद गुरुवार को अपने चाहने वालों को छोड़कर इस दुनिया को अलविदा कहने वाले देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का भोले शंकर की नगरी बनारस से अटूट रिश्ता था और अपने पत्रकारिता जीवन की प्रारंभ उन्होंने यहीं से किया था।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई के निधन पर पूरा देश शोक में
अटल जी की बनारस से जुड़ी बहुत यादें हैं .

राजनीति और पत्रकारिता की शुरुआत उन्होंने बनारस से ही की I पत्रकारिता जीवन की तो बुनियाद ही बनारस में पड़ी। 1942 में चेतगंज के हबीबपुरा मोहल्ले से निकलने वाले अखबार समाचार में उन्होंने लिखना शुरू किया था। 1948 में वाराणसी से उन्होंने राष्ट्रीय स्वयं सेवक की पाक्षिक पत्रिका चेतना’ का प्रकाशन किया और उसके सम्पादक रहे। महात्मा गांधी की हत्या के बाद पूरे भारत में गिरफ्तारी का दौर था I उस समय अटलजी बनारस में ही छुपे थे।
पत्रकारिता जीवन की शुरुआत में अटल जी समाचार’ में लेख यात्रा संस्मरण और रिपोर्ट लिखा करते थे उसके बाद उन्होंने लखनऊ से पत्रिका स्वदेश’ निकाली लेकिन ज्यादा समय तक वह भी चल नहीं सकी। बाद में अटल बिहारी वाजपेयी अर्जुन और पांचजन्य के संपादक भी रहे।
बनारस में रिक्शे और नाव पर सैर करने में उन्हें बहुत आनंद आता था वह अपने ऊपर खर्च होने वाले पैसे का हिसाब रजिस्टर में रखते थे I

उत्तर प्रदेश सरकार के राज्यमंत्री नीलकंठ तिवारी के विधानसभा क्षेत्र शहर दक्षिणी में अटल जी जनसंघ की बागडोर संभालने के बाद बनारस में जड़ें मजबूत करने के लिए खुद गलियों में वोट मांगने निकले थे। वह समय था 1971 का जब गढ़वासी टोला मोहल्ला में कार्यकर्ता सम्मेलन करने के बाद पक्का महाल की गलियों में वोट मांगने निकले थे। उनके घूमने का इतना असर पड़ा कि पक्का महाल बीजेपी का गढ़ बन गया।

जेपीएस राठौर के वर्ष 1996 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय छात्र संघ अध्यक्ष चुने जाने पर अटल बिहारी वाजपेयी बीएचयू छात्रसंघ का उद्घाटन करने पहुंचे थे।
वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव के वक्त बीजेपी प्रत्याशी शंकर प्रसाद जायसवाल के समर्थन में उन्होंने ऐतिहासिक बेनियाबाग मैदान में जनसभा की थी। टाउनहाल में उनकी सभा आज भी बनारस के पुराने लोगों को भूली नहीं है।

बनारस में अंतिम सभा वर्ष 2005 में
राजनीति के शिखर पर पहुंचने से पहले अटल जी ने बनारस में काफी दिन गुजारे तो उसके बाद भी यहां से उनका नाता टूटा नहीं था। आखिरी बार वे 2005 में कृष्णानंद राय की हत्या के बाद 13 दिनों तक चले बीजेपी के धरने में शामिल होने आए थे। कचहरी पर उनकी अंतिम सभा हुई थी।

बनारसी ठंडाई के दीवाने थे अटलजी

अटल जी की जितनी तारीफ की जाए कम है. बनारस शहर के दक्षिणी विधानसभा के 7 बार जीते हुए पूर्व विधायक श्यामदेव राय चौधरी को पता चला कि आडवाणी जी बनारस आ रहे हैं, वह एक माला लेकर स्टेशन पर चले गए और आडवाणी जी के निकलने पर उन्होंने उनको माला पहना दिया पर तब उनको पता चला कि दूसरे डिब्बे में अटलजी भी है तो संकोचवश श्यामदेव राय चौधरी दादा उनके पास गए और उनसे क्षमा मांगे की मुझे जानकारी नहीं थी और मैं एक ही माला लेकर आया था तो अटल जी ने मुस्कुराते हुए कहा माला नहीं गले लगो यह ज्यादा जरूरी है.

इस तरह के शानदार व्यक्तित्व के धनी थे हम सबके पूर्व प्रधानमंत्री माननीय अटल बिहारी बाजपेई.

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